भारत जो की दुनिया का सातवा सबसे बड़ा देश है ,  और दूसरा सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है |  यहाँ पर लगभग अस्सी प्रतिशत लोग हिन्दू धर्म को मानते है |  हिन्दू धर्म जो की दुनिया का सबसे पुराना धर्म है और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इनके भगवान् कोई कहानी नहीं है बल्कि वो एक सच है | एक ऐसा सच जो कभी धरती पे हुआ करता था, या फिर आज भी है |

सभी भगवानो की एक अलग कहानी है, एक अलग संस्कृति है, जिसे हम मानते है |  बहुत से हिन्दू धर्म का पालन करने वाले लोग मानते है की भगवान् असली है, उनका भी एक रूप है, फिर चाहे वो कभी दिखाए न दिए हो |  दुनिया के दूसरे लोगो के मुकाबले हिन्दू धर्म मानने वाले यह मानते है की भगवान् असली है |

ज्यादातर लोग यह मानते है की भगवान् आसमान में कही से आते है | ऐसा शायद वो टीवी पर सीरियल देख कर कहते हो या पुरानी किताबे पढ़ कर, और कुछ लोग ऐसा भी मानते है की यह सब बस कहानियाँ है | लेकिन अगर बाइबिल में देखा जाये तो भगवान् एक बहुत ही शक्तिशाली हस्ती है, और वेदो में ऐसा लिखा है की हिन्दू भगवान् टेक्नोलॉजी का बहुत इस्तेमाल करते थे और शायद इसी वजह से वो शक्तिशाली थे, और यही  से सवाल दिमाग में आते है , की कही न कही भगवान् वो लोग थे जो किसी दुसरे गृह से पृथ्वी पर आये थे |

पश्विमी लोग कुछ अलग ढंग से सोचते है, उनमे से कुछ ऐसा भी मानते है की भगवान् किसी और गृह से धरती पर आये थे | महाभारत पढ़ने पर ऐसा लगता है की इस लड़ाई में बहुत कुछ ऐसा हुआ था जो की टेक्नोलॉजी के बिना संभव नहीं था| इसमें उड़ने वाले जहाजों के बारे में बताया गया है, ऐसे विनाशकारी हथियारों के बारे में बताया है जो आज भी नहीं बने है, जैसे की हथियार जो की आवाज से चलते हो, ब्रह्मास्त्र एक ऐसा ही हथियार था जो की सिर्फ उसके मालिक की आवाज़ से चलता था, ऐसा भी हो सकता है की अर्जुन को महाभारत की लड़ाई में जब ब्रह्मास्त्र मिला था, तो वह उसे उसकी आवाज़ पर configure  करके दिया हो | यह एक ऐसा हथियार था जिनसे पूरी सभ्यता  ख़त्म हो सके, और शायद वो आज का परमाणु बम भी हो सकता था |

विमानों के बारे में बताया गया है,  जिसमे बैठ कर देवता धरती पर आते थे, और हिन्दू किताबो में ऐसा बहुत जगह लिखा है की कैसे भगवान् विमानों का उपयोग करते थे | तो क्या ऐसा समझा जाये की देवता परग्रही थे जो की किसी दूसरे गृह से यहाँ पर आये थे |  जो लोग इस पर रिसर्च कर रहे है वो इस बात को सही मानते है और कहते है की यह सिर्फ हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि और भी धर्मो में हुआ था |

शिव जिसे हम महादेव कहते है, वो देवताओ के देवता है और भगवानो के भगवान् | और इसका मतलब है की वो सबसे ज्यादा शक्तिशाली भगवान् है |  शिव के दो प्रमुख कार्य है , एक तो जीवन और दूसरा विनाश , क्योंकि विनाश के बिना जीवन असंभव है | शिव के पास एक डमरू है जिससे वो जीवन बनाते है , गले में एक सांप है , और हाथ में त्रिशूल है जिसे विनाश के लिए काम लिया जाता है |  और माथे पर एक तीसरी आँख है |  तीसरी आँख खुलने का मतलब जो सामने है उसका विनाश |  तीसरी आँख एक परमाणु बम से भी ज्यादा विनाशकारी है जब वो खुलती है| तो शिव कौन है, यह सवाल हमारे दिमाग में हमेशा आता है |  और ज्यादातर लोग कहते है की शिव सबसे बड़े भगवान् है |

एक बार ब्रह्मा, जो की जीवन बनाते है और विष्णु जो की जीवन रक्षा करते है , दोनों के बीच में बहस हो रही थी की कौन सबसे बड़ा है? तभी एक रौशनी आई और उसमे से आवाज़ आयी की मैं सबसे बड़ा हूँ, हमने अभी तक यह ही पढ़ा है और मानते भी आ रहे है, शिव को अगर नटराज के रूप में देखे तो उनके आस पास एक आग का गोला नज़र आता है, आखिर वो है क्या है? क्या हम ऐसा मान सकते है की वो एक आग के यन्त्र के अंदर है? सोचने में अजीब है, लेकिन ऐसा हो भी सकता है, और सबसे दिलचस्प बात यह की हर धर्म में शिव जैसा ही एक भगवान् हुआ है जिनको अलग-अलग धर्मो में अलग-अलग नाम से जाना जाता है , जैसे आंकी , ऑर्डनैस, जूस, कूकले कान वगैरह|

इससे सम्बंधित लेखो को लगभग चार हज़ार सालों पहले पढ़ा गया था |  लेकिन लोग ऐसा भी कहते है की इनको कुछ एक हज़ार साल पहले ही लिखा गया है |  और यह हमारे संस्कृति का ही हिस्सा है |  और एक वंश से दूसरे वंश में यह लेख जाते रहे है |  

ऐसा भी माना जाता है की शिव तब आये जब आधुनिक मानव की शुरुआत हुई |  और इसके साथ ही उस घटना की भी शुरुआत हुई जिसमे कहा गया की एक विनाशकारी बाढ़ आयी थी |  और हर धर्म के लेखो में एक विनाशकारी बाढ़ की बात कही गयी है |  यह एक ऐसी बाढ़ थी जिसमे ज्यादातर जीवन ख़तम हो गया था और वो भी एक दिन में |  साथ में बात यह भी है की शिवा एक विनाश के भगवान् भी है |  क्या हम इस बात को विनाशकारी बाढ़ से जोड़ सकते है , क्योंकि बाढ़ के बारे में सब धर्मो में लिखा गया है |

बाढ़ के बाद शिव ने नया मानव जीवन बनाया|  तो क्या ऐसा हो सकता है की शिव की यह ज़िम्मेदारी थी की वो धरती पे पुराने मानव जीवन को नष्ट करे और नया मानव जीवन बनाये |  क्योंकि ऐसा करने के बाढ़ ही आज के आधुनिक मानव का जन्म हुआ |  विशेषज्ञ कहते है की इसकी पड़ताल करने के लिए हमें हिन्दू मंदिरो को देखना चाहिए |

भारत में मुंबई से लगभग २०० किलोमीटर दूर दक्षिण में कैलास मंदिर है, जो की एक मील तक है ,  और जिनको बहुत ऊंचाई पर बनाया गया है , और कार्बन डेटिंग से पता चलता है की यह कुछ 1080 AD में बना  है |  यह शिव का बहुत ही पुराना और बड़ा मंदिर है ,  और पुरातत्व वेद ऐसा मानते है की इस मंदिर को एक चट्टान से बनाया गया है, और जिसे ऊपर से बनाना शुरू किया गया था |

इस चट्टान को काटना और वह भी ऊपर से और उसे मंदिर का अकार देना इसका मतलब की चार लाख टन की चट्टान का मलबा  पैदा होना, और इससे भी बड़ी बात की पुरातत्व वेदो के अनुसार इस मंदिर को बनाने में अठ्ठारह साल लगे |  देखा जाए तो आज के समय में भी यह लगभग असंभव है इंसान इस तरह के मंदिर का निर्माण करे |  यह किसी मशीन के इस्तेमाल के बिना असंभव है |  आज भी यह पता नहीं चल पाया है की किस तरह से इस मंदिर का निर्माण हुआ होगा |

और इसके मलबे की बात की जाये तो मलबे का कुछ नहीं पता, की इतनी साड़ी खुदाई हुई तो मलबा कहा गया, इस मंदिर के आस पास भी कोई मंदिर नहीं बनाया गया जिसमे इस चट्टान के निकले हुए मलबे का इस्तेमाल हुआ हो.  तो ऐसा कैसे हो सकता है की किसी मंदिर को बनाने में अठ्ठारह साल लगे हो और चट्टान का मलबा भी गायब हो गया हो?

पुराने वेदो में एक मशीन के बारे में जिक्र किया गया है , जो की अपनी तरंगो से किसी भी चीज़ को काट सकती थी |  इस मशीन के बारे में वेदो में बहुत जगह पर लिखा गया है , जिसको पहाड़ और लोहे जैसी धातु को काटने में काम में लिया जाता था |  तो हो सकता है की इस तरह से इस मंदिर का निर्माण हुआ हो |

तो क्या यह संभव है की कोई ऐसी मशीन भी थी हज़ारो साल पहले जिसे इंसान इस्तेमाल करते थे |  लेकिन सबसे रोचक यह बात है की कुछ पुरातत्व वेद कहते है की हां ऐसी मशीन थी लेकिन इस मंदिर को ऊपर के बजाये नीचे से बनाना शुरू किया गया था, यानी धरती  के भी नीचे से |  इस मंदिर में बहुत सी  गुफाये  है, कुछ तो सीधी जाती है, लेकिन कुछ गहराई में जाती है, लगभग 40 फ़ीट से भी नीचे|  इन गुफाओ का क्या मतलब है यह अभी तक नहीं पता|  भारत सरकार ने इन गुफाओ में जाने पर रोक लगा राखी है और गुफाओ को दरवाजो से बंद किया हुआ है |

लोगो को ऐसा मानना है की यह गुफाये धरती के अंदर एक गुप्त शहर में जाती है |  सब बातें सही है लेकिन इन गुफाओ पर ताला क्यों लटकाया है यह नहीं पता |

1876 में एक मशहूर धार्मिक लेखिका एमा  ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम था Ghost Land जिसमे उन्होंने एल्लोरा की गुफाओ के बारे में लिखा था | उन्होंने एक गुमनाम धार्मिक गुरु से मुलाक़ात की थी जिनका नाम था कवेलिएर लोई , जिन्होंने एक गुप्त सभ्यता के बारे में बताया था , जिसमे वो एक बार एल्लोरा की गुफाओ के अंदर तक गए थे |  और जिस गुफा में वो गए थे वो एक बड़े से कमरे में खुलती थी , उनके अनुसार उस बड़े कमरे में सात सिंहासन थे जो की अपनी जगह पर हवा में ऊपर नीचे हो रहे थे | और उन सिंहासनो पर सात रहस्यमयी आकृति नज़र आ रही थी |

इन सातो में जो बीच के आकृति थी वो अजीब थी क्योंकि वो बार बार गायब हो रही थी |  अब सवाल यह है की इस मंदिर के नीचे इतनी गहरी गुफाओ का क्या काम? कुछ पुरातत्व विद कहते है की इस तरह से हम कह सकते है की शिवा का उस विनाशकारी बाढ़ से सीधा सम्बन्ध था |  यह एक तरह का शहर हो सकता है जिसे गुफाओ में बसाया गया हो , कुछ लोगो को बाढ़ से बचाने के लिए|  और यह एक परग्रही का स्पेस स्टेशन भी हो सकता है|

फिलहाल तो हम अपने रिसर्च से ऐसा कहते है की यह मंदिर कब बना था लेकिन इस मंदिर में ऐसी कोई तारीख नहीं लिखी है या फिर कोई ऐसा हिंट नहीं है जिससे यह पता चले की यह मंदिर कब बना था |  क्या ऐसा हो सकता है की इस मंदिर के नीचे एक परग्रही शहर हो ?  और अगर ऐसा है तो क्या ऐसा हो सकता है की शिव किसी दुसरे गृह से आये थे जिन्होंने अपनी टेक्नोलॉजी इन्सानो को दी?  और उसके बाद मानव जाती का विनाश कर दिया |

इसके अलावा ऐसे बहुत से चिन्ह है जिनमे बहुत अद्भुत शक्तिया है , जैसे की शिव लिंग |    भारत में सिरसी नाम की जगह में एक बहुत ही मशहूर तीर्थ है जिसे सहस्त्र लिंगा कहा जाता है |  यहाँ नदी में पानी काम होते ही बहुत से प्राकृतिक शिवलिंग दिखाई देने लगते है जो की चट्टानों पर बने है |  जिन्हे महाशिवरात्रि पर पूजा जाता है |  यह फरवरी या मार्च में मनाया जाता है, और इस दिन के आस पास सरवाला नदी का जलस्तर घाट जाता है जिससे प्राकृतिक शिवलिंग नज़र आने लग जाते है |

यहाँ तक की चीन और जापान में भी शिवलिंग दिखाई दे जाते है |  ऐसा कहा जाता है की शिवलिंग को सबसे पहले दो हज़ार साल पहले देखा गया था, और शिवलिंग की आकृति का क्या मतलब है यह भी शायद पता नहीं था , लेकिन पुरातत्व वेत्ता यह भी कहते है की शिवलिंग एक तरह का टेक्नोलॉजी मशीन हो सकते है |

सन 1900 में स्वामी विवेकानंद ने पेरिस में एक सम्मेलन में बताया की शिवलिंग एक शक्ति का स्त्रोत है जो

की अंदर और बाहर आती जाती है |  तो शिवलिंग एक शक्ति का स्त्रोत है, लेकिन पाश्चात्य देशो में यह बस एक Felix के निशाँ का प्रतीक है, जबकि शिवलिंग एक मजबूत शक्तृ का खम्भा है |  

यहाँ तक की शिवलिंग एक परमाणु शक्ति का भी प्रतीक हो सकता है ,  क्योंकि शिवा को विनाशकारी भी कहा गया है|   ऐसा इसलिए क्योंकि शिवलिंग का आकार आज के नुक्लेअर रिएक्टर से बहुत मिलता जुलता है |  और शिवलिंग के आस पास की जगह जहा से पानी बाहर निकल जाता है, वो जगह नुक्लेअर रिएक्टर में भी इसी काम में लाई जाती है जहा से ख़राब पानी बाहर निकल सके |

पुराने ज़माने में और आज भी हिन्दू शिवलिंग के ऊपर पानी चढ़ाते है ,  और नुक्लिअर रिएक्टर पर भी पानी चढ़ाया जाता है ताकि उसे ठंडा रख्खा जा सके |  और ज्यादातर प्राकृतिक शिवलिंग पानी के अंदर या पानी के आस पास ही मिलते है |  तो शायद हम ऐसा कह सकते है की शिवलिंग एक तरह से पुराने ज़माने के नुक्लिअर रिएक्टर हो ?

इस तरह से शिवलिंग और आज के नुक्लिअर रिएक्टर हमें एक सम्बन्ध बना कर बता रहे है की आज की और पुरानी टेक्नोलॉजी में कितनी समानताये थी |  यह सब बातें उस विशाल बाढ़ के पहले की है जिसके बाढ़ मानव जाती लगभग ख़त्म हो गयी थी | ऐसा भी हो सकता है की यह सब कुछ बताता है की मानव जाती पहले कितनी आधुनिक थी |  

आगे बढ़ने से पहले संत अगस्तस्य के बारें में बात करते है|  उज्जैन की एक लाइब्रेरी में संत अगस्तस्य के बारे में किताबें मिलेंगी , जिसमे लिखा गया है की उस समय की मानव सभ्यता कितनी आधुनिक थी ,  यह कुछ चार हज़ार साल से भी ज्यादा पुरानी है ,  अगस्तस्य शिव भक्त थे, और उन संतो में आते थे जिनके पास उड़ने तक की शक्तिया थी |  कहा जाता है की अगस्तस्य ने बहुत से टेक्नोलॉजी पर काम किया था , खासकर औद्योगीकरण को लेकर, इन्होने पानी के जहाज से लेकर टेलिस्कोप, पैराशूट से लेकर ऐसी मशीन पर काम किया जो उड़ सकती थी |  अगस्तस्य एक तरह एक गुप्त विज्ञानं का हिस्सा थे, शायद उन्हें धरती से बाहर के लोग सीखा रहे थे, तभी उन्होंने इतने आविष्कार किये थे | डा कुक्कुनोर ने अगस्तस्य के बारे में पढ़ा और American Chemical society के एक इवेंट में 1900 में बताया की इन किताबो में बताया गया है की किस तरह से एक इलेक्ट्रिक बैटरी बनाई जा सकती है |

सन 1900 तक तो बैटरी जैसी चीज़ो पर वैज्ञानिक काम कर रहे थे , लेकिन इसको बनाने का तरीका तो अगस्तस्य के पास हज़ारो साल पहले से था|  अगर अगस्तस्य को बैटरी के बारे में पता था तो हम उन अविष्कारों को नहीं नकार सकते जो की उस किताब में लिखे है, जैसे की उड़ने वाले विमान|

मार्च 31 , 2016 में लेखक डेविड चिल्ड्रेंस फिजिक्स के प्रोफेसर डा माइकल देंनीन से कैलिफ़ोर्निया की यूनिवर्सिटी में मिलें, वो यहाँ पर अगस्तस्य की बनाई हुई बैटरी को दुबारा उसी तरह से बनाना चाहते थे जैसे उसने बनाई थी |  और वो इसमें सफल भी हुए , उन्होंने एक वाल्ट की एनर्जी बनाई जिससे एक इंसान को 10 मीटर की ऊंचाई तक उठाया जा सकता है |  अगर ऐसा है तो धार्मिक लेखिका एमा की बात सच हो सकती है जिसमे उसने कहा है की उसने कैलाश मंदिर में सात लोगो को उनके सिंहासन के साथ अपनी जगह से हवा में उड़ते देखा था |

लेकिन इसके साथ एक सवाल आता है की अगर ऐसा था तो वो सब मशीन कहा गयी ? परग्रही पर काम करने वाले पुरातत्ववेत्ता बताते है की इसका जवाब कैलाश पर्वत में मिल सकता है|

ऐसे बहुत से लोग है जिनको कैलाश पर्वत पर कुछ अजीब से अनुभव हुए है ,  कुछ तो यहाँ तक कहते है की यहाँ पर  एक परग्रही निवास स्थल भी हो सकता है |  कैलाश पर्वत एक बाईस हज़ार फ़ीट ऊंचा पर्वत है , इस पर्वत को शिव का घर भी कहा जाता है , डॉ मोलडेचेफ , जिन्होंने धरती के बहुत से दूरस्थ इलाको के बारे में छानबीन की है और कई किताबें भी लिखी है ,  1999 में इन्होने लगभग एक महीना कैलाश पर्वत पर निकाला था और इनके साथ कुछ रूस के वैज्ञानिक भी थे , ताकि वो इसके बारे में जानकारी जुटा सकें,   और इनको कुछ अजीब से अनुभव हुए |

इन्होने बताया की कैलाश पर्वत शिव के घर से भी बहुत ज्यादा कुछ है , यह एक मानव निर्मित पिरामिड जैसा है | इसे या तो इंसानो ने बनाया है या फिर परग्रहीयो ने,  और अगर हम इसे पिरामिड माने तो यह दुनिया का सबसे बड़ा पिरामिड कहलाया जायेगा|  तो क्या यह बात सच हो सकती है की कैलाश पर्वत एक ऐसी मानव निर्मित संरचना है जो की शिव का घर है ?  और यह भी सच है की कुछ लोग जो इस पर्वत पर खोजबीन करने आये थे , वो पर्वत पर ही मौत का शिकार हुए|  और शायद इसी कारण से चीन ने कैलाश पर्वत पर चढ़ना मन कर रखा है |  बहुत से लोगो ने कुछ अजीब घटनाओ के बारे में भी बताया है |  जैसे की आँखों की रौशनी जल्दी कमजोर होना, त्वचा पर झुर्रिया पड़ना, और बालो का सफ़ेद होना | तो क्या ऐसा हो सकता है की कोई ऊर्जा इस पर्वत से निकल रही हो? पुराने पुरातत्ववेत्तता  कहते है , की हाँ ऐसा हो सकता है. हो सकता है की कैलाश पर्वत से रेडियोएक्टिव तरंगे निकल रही हो|

इसे समझने के लिए पुरातत्ववेत्ता मकाऊँ की गुफाओ का उदहारण देते है जो की कैलाश पर्वत से छ सौ मील की दूरी पर है |  बौद्ध धर्म मानने वालों ने लगभग पचास हज़ार लिपिया यहाँ पर राखी है ,  1907  में हंगरी के एक ब्रिटिश रेसेअर्चेर यहाँ आये और इन गुफाओ को ढूँढा|

इन्ही पाण्डुलिपिओ में एक बहुत अजीब सा चित्र मिला जो शायद दूसरे दशक का है |  इसमें दिखा रखा है की कैसे मेरु पर्वत में कॉस्मिक रेडिएशन्स है, मेरु पर्वत को कैलाश पर्वत भी कहा जाता है | यह चित्र बहुत ही टेक्नोलॉजिकल है ,  इस तरह के चित्र तो नुक्लेअर रिएक्टर के अंदरूनी काम करने के तरीके को बताते है | तो ऐसा भी हो सकता है , इसमें सारा नुक्लेअर कचरा भरा हो| यह उसी तरह से है जैसे की नेवादा में एक पर्वत है जिसे नुक्लेअर कचरे को इक्कठ्ठा करने के लिए रखा जाता है |  और इसीलिए जिस रेडिएशन की हम बात करते है वो इसका असर हो सकती है |

5  अगस्त 1957 को रूस के एक philosopher निकोलस रोएरिच ने एक उड़नतश्तरी देखी जो दक्षिण से दक्षिण पश्चिम की तरफ जा रही थी |  और बहुत से तीर्थ यात्रिओ ने भी इस तरह की उड़नतश्तरी देखी है , जो कैलाश पर्वत तक जाते है |  और वो ये भी बताते है की कभी कभी तो यह उड़नतश्तरी सीधी कैलाश पर्वत के अंदर चली जाती है |  कई लोग ऐसा भी कहते है की पर्वत के अंदर एक पूरा शहर हो सकता है|

तो अगर कैलाश पर्वत कभी रेडियोएक्टिव भी रहा हो , तो क्या यहाँ पर जाना क्या सुरक्षित है, क्योंकि लोगो ने उड़नतश्तरी देखने की बात की है |  और या तो आज भी इसमें कोई टेक्नोलॉजी है जिसे परग्रही इस्तेमाल कर रहे है | ऐसा हो भी सकता है , लेकिन आज के समय में हमें एक नयी सोच के साथ सोचने की ज़रुरत है, हमें अपने वेदो को वापस से पढ़ने की ज़रुरत है, साथ ही दुसरे पुराने धर्मो की किताबे भी जिनमे शिव के बारे में बताया गया है, या फिर उनके जैसे ही किसी के बारे में बताया गया है |

तो क्या शिव कोई शक्तिशाली इंसान थे, या शक्तिशाली भगवान् या फिर कोई शक्ति ? कोई ऐसे शक्ति जो की धरती की नहीं थी |