एक कर्मचारी और नियोक्ता के लिए कार्यस्थल हमेशा से ही एक लड़ाई का मैदान रहा है| कर्मचारी  हमेशा अपने आप को साबित करने के लिए लड़ता है और नियोक्ता हमेशा कर्मचारियों से दूर हे रहते है|  कभी कभी यह कर्मचारी के लिए अच्चा होता है और कभी कभी नियोक्ता के लिए| लेकिन अंतिम फैसला हमेशा कंपनी के  पक्ष में ही होता है|

एक कर्मचारी और नियोक्ता के लिए कार्यस्थल हमेशा से ही एक लड़ाई का मैदान रहा है| कर्मचारी  हमेशा अपने आप को साबित करने के लिए लड़ता है और नियोक्ता हमेशा कर्मचारियों से दूर हे रहते है|  कभी कभी यह कर्मचारी के लिए अच्चा होता है और कभी कभी नियोक्ता के लिए| लेकिन अंतिम फैसला हमेशा कंपनी के  पक्ष में ही होता है|

कर्मचारी के लिए हमेशा एक उद्देश्य होता है कि वो अपने आप को साबित करे और सबकी नजरो में बना रहे |  उसके लिए कभी कभी काम से ज्यादा यह जरूरी हो जाता है की वो सबकी नजरो में बना रहे|  हर कर्मचारी  का यह मिशन होता है की वो अपना अच्छे से अच्छा  काम  करे फिर चाहे उसकी सैलरी बड़े या न बड़े|

मेनेजर का काम भी सिर्फ Excel sheets तक रहता है , उसे भी बस काम से मतलब होता है और कई बार तो उसके आस पास चापलूसी करने वाले भी बहुत होते है|

बहुत बार ऐसा भी होता है की कंपनी के पालिसी में कुछ और लिखा है लेकिन HR कुछ और कहता है |  और कभी कभी तो कंपनी की पालिसी को हे पुरानी या बेकार बताता है|

वैसे एक कर्मचारी को कभी अपने नियोक्ता को यह कहने का मौका नहीं देना चाहिए की “तुम्हे पता है की इस कंपनी ने तुम्हारे लिए क्या क्या किया है?”, क्योकि फिर कर्मचारी कुछ बोल नहीं पाता है|

और कंपनी को भी यह समझाना चाहिए की कर्मचारी के बिना कैसे कंपनी, अगर वो कर्मचारी के लिए नहीं करेगी तो कर्मचारी भी सिर्फ उतना हे करेगा जितनी उसे सैलरी मिलती है|